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चढाव उतार समता

शिक्षण-विधि-सोपान चढाव उतार समता सत्ता और शक्ति की लीला रूपी इस जगत् में , जब शक्ति प्रचण्ड रूप धारण करती है , काली माता जिनकी रक्तिम जिह्वा बाहर लटकती हुई , माता की आठो भुजाओं में दिव्य शस्त्र , गले में कटे हुये सिरों की मुण्डमाला , माता सत्ता को अपने पैरों तले रौंद कर प्रगट होती हैं । जब शिव समाधिष्ट हो जाते हैं , माया पलायन कर जाती है , शिव का तीसरा चक्छु खुलता है , माया जल कर भस्म हो जाती है । जब शिव और पार्वती सम भाव से कैलाश पर्वत पर साथ बैठ सतसंग करते है , कार्तिकेय और गणेश के रूप में यह जगत् उपस्थित हो जाता है । समुद्र में लहरे हैं , लहरे छोटी हैं , लहरे बडी हैं , लहरो में स्पर्धा है , लहरों को एक दूसरे से भय है , समुद्र तो सदैव शान्त है । लहरे , समुद्र यह सभी उपाधियां मात्र है , जो जल के सत्यत्व पर आरोपित हैं । आत्मस्वरूप के सत्यत्व पर ही यह सम्पूर्ण शिव और शक्ति की लीला गति कर रही है । जब तक व्यक्ति इस लीला के दृष्यों में लिप्त है , वह राग-द्वेष , काम-क्रोध , इच्छा-मोंह का भोक्ता है । श्रुति भगवती अपने अमृतस्य पुत्रों को उपदेश करती हैं , अपने स्वरूप मे...

रामलीला कृष्णलीला

शिक्षण-विधि-सोपान रामलीला कृष्णलीला यह जगत् रामलीला है । यह जगत् कृष्णलीला है । यह जगत् सत्ता और शक्ति की लीला है । उपरोक्त लीला के दो कथानक , प्रथम- इदं द्वितीयं अहं हैं । इदं अर्थात् अहं से अतिरिक्त सकल जड और जीव हैं । सत्ता असंग , निराकार अद्वयं है । शक्ति विकारी है । शक्ति का प्रथम विकार हिरण्यगर्भ है । यह वन जी है । द्वितीय चरण का विकारा , पंचमहाभूत हैं । यह टू जी है । जहाँ केवल टू जी है , वह जगत् का जड प्रभाग है । जहाँ टू जी और वन जी दोनो हैं , वह जगत् का जीव प्रभाग है । जीव प्रभाग का भोक्तित्व , पुरुष की अभिव्यक्ति है , अर्थात् दर्पण में प्रतीत होने वाली पुरुष की छाया क्षवि है । उपरोक्त वर्णित जगत् के दोनो अवयव इदं और अहं मात्र अनुभूतियाँ हैं , जिनका कोई अस्तित्व नहीं है । उपरोक्त वर्णित इदं और अहं के व्यापार में अर्जित होने वाली सम्पदायें राग-द्वेष , काम-क्रोध , इच्छा-मोंह हैं । इन सम्पदाओं का भोक्ता , वह प्रतीत होने वाला पुरुष जिसे अहंकार कहा जाता है । उपरोक्त जगत् में किसका जन्म हो रहा है , किसकी मृत्यु हो रही है ? कौन क्या अर्जित कर रहा है ? किसकी क्या सम्पदा है ? विचा...

विचार क्रम

शिक्षण-विधि-सोपान विचार क्रम शास्त्रों में उपदेशित सृष्टि के सृजन क्रम के अनुसार , ब्रम्ह ने अपने एकल अद्वयं स्वरूप को , दो रूप नामत: शिव अर्थात् सत्ता और शिवा अर्थात् माता पार्वती अर्थात् माया शक्ति के रूप में व्यक्त किया है । पुन: शक्ति तीन भागो नामत: ज्ञान शक्ति अर्थात् सत्व गुण , क्रिया शक्ति अर्थात् रज़स गुण , इच्छा शक्ति अर्थात् तमस गुणों में विभक्त हुई है । पुन: शिव ने , पंच महाभूतों को सृष्टि की रचना में प्रयुक्त पदार्थ रूपों की उपलब्धता के हेतु से , अपनी सत्ता प्रदान किया है । पुन: शक्ति ने , सम्पूर्ण जगत् को यथा स्वरूप सत्ता और शक्ति के समन्वित रूप में प्रगट किया है । इसलिये ब्रम्ह विचार का क्रम उपरोक्त वर्णित क्रम से ठीक विपरीत क्रम में हैं । स्थूल जगत् से प्रारम्भ कर सूक्ष्मतम् ब्रम्ह पर्यन्त की यात्रा है । साधक व्यक्ति को अपने पंच कोषो नामत: अन्नमयं कोष , प्राणमयं कोष , मनोमयकोष , विज्ञानमय कोष और आनन्दमय कोष का निषेध करते हुये सूक्ष्मतम् तत्व आत्मा पर्यन्त की साधना है । उपरोक्त साधना में शास्त्र दर्पण की भाँति साधक को उसके स्वरूप अर्थात् आत्मा का दर्शन करात...

ब्रम्ह-विचार के साधन

शिक्षण-विधि-सोपान ब्रम्ह-विचार के साधन ब्रम्ह-विचार अति-सूक्ष्म-तत्व का विचार है , इसलिये अति सक्षम मस्तिष्क की आवश्यकता होती है । लोकव्यवहार में संलग्न मस्तिष्क मनो-विकारों से आक्रांत और विक्षेपों की चंचलता से युक्त होता है । उपरोक्त के विपरीत ब्रम्ह-विचार के लिये अति शाश्वत्-शान्त मस्तिष्क की आवश्यकता होती है । मस्तिष्क के चार प्रभाग नामत: मन , बुद्धि , चित्त , अहंकार प्रत्येक के परमार्जन की अपेक्षा होती है । उपरोक्त मन:स्थिति को प्राप्त करने के लिये साधन-चतुष्टय का उल्लेख मिलता है । प्रथम प्रभाग मन , अर्थात् संकल्प-विकल्प प्रभाग की अस्थिरता का निवारण कर , दृढ-निश्चयात्मक स्थिति प्राप्त करने के लिये , विकसित विवेक की वाँक्षना होती है । विक्षेपों के शमन के लिये सांसारिकता के प्रकरणों से वैराग्य की अपेक्षा होती है । वैराग्य की परिभाषा की जाती है , कि राग-द्वेष का शिथलीकरण वैराग्य है । यह भी शान्त मस्तिष्क की अपेक्षा के दिशा में साधन है । पुन: मस्तिष्क के विक्षेप को अनेक भागों में विभक्त करके प्रत्येक विभक्ति को शान्त करने की अनुशंसा की गई है । मन के संकल्प-विकल्प के शमन क...

ब्रम्ह जिज्ञासा

शिक्षण-विधि-सोपान ब्रम्ह जिज्ञासा किसी भी लोकव्यवहार के प्रकरण में जीव-मनुष्य के मन में किसी इच्छा का उदय होता है । तो इच्छा का उदय होने के बाद ही उस व्यक्ति को उस इच्छा का पता चलता है । परन्तु व्यक्ति के हृदय में ब्रम्ह को जानने की जिज्ञासा का उदय का प्रकरण , उपरोक्त वर्णित वस्तु-रूप-सन्सार की किसी इच्छा के प्रकरण से , पूर्णतया भिन्न स्थिति का फल होता है । यह ब्रम्ह-जिज्ञासा का हृदय में उदय होना , एक विशिष्ट मानसिक स्थिति की उपलब्धता पर ही सम्भव हो सकती है । उपरोक्त वर्णित विशिष्ट मानसिक स्थिति का विस्तार इस प्रकार है । विगत में प्रकाशित लेखों में से , तीन रचनागत त्रुटियाँ शीर्षक के लेख की ओर ध्यान निवेदित है । उपरोक्त सन्दर्भित लेख में , माया-कल्पित-मस्तिष्क में रचनागत तीन त्रुटियों का उल्लेख वर्णित है । उपरोक्त लेख में ही संदर्भित तीनो त्रुटियों के निवारण का पथ भी बताया गया है । उपरोक्त सन्दर्भ की प्रथम दो त्रुटियों नामत: एक- मल , और दो- विक्षेप त्रुटियों के निवारण पुरुषार्थ से परिष्कृत मस्तिष्क में , ब्रम्ह जिज्ञासा का उदय होता है । इस स्थल पर यह स्पष्ट करना भी विषय क...

आनन्द स्वरूप

शिक्षण-विधि-सोपान आनन्द स्वरूप मस्तिष्क में वृत्तियों का आभाव लय है । यह सुशुप्ति दशा है । जागृत दशा की प्राप्ति , मस्तिष्क में वृत्तियों का विक्षेप है । यह माया लोक है । पारमार्थिक आत्मा की “ शान्ति ” ही एकमात्र दशा है । यह अनन्त है । अनन्त में किसी विकार की कल्पना सम्भव नहीं है । समस्त विक्षेप माया के क्षेत्र में हैं । माया के क्षेत्र की स्थित वही है जो दर्पण में प्रतिबिम्ब की होती है । इसमें अनुभूति है , व्यवहार है , परन्तु कोई स्थिति नहीं है । जब तक व्यक्ति इन विकारों के साथ संलग्न है , शान्ति उसके लिये दुर्लभ है । दृष्टा , दृष्य , और दृग यह तीनों ही अनुभूति मात्र हैं , इनमें से तीनों का कोई अस्तित्व नहीं है । यही मोंह का जाल है , जिसमें माया शक्ति ने समस्त को बाँध करके रखा है । एक व्यक्ति जंगल में मार्ग भूल गया , रात्रि हुई वह डरा तो हुआ था , परन्तु सोने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं था , बेचारा सोया , तो स्वप्न देखता है कि शेर सामने उसे खाने के लिये खडा है , बेचारे के पास उससे बचने के लिये कोई उपाय नहीं था , हारा हुआ वह व्यक्ति उस शेर से पूछता है , कि क्या तुम ...

दृष्टान्त

शिक्षण-विधि-सोपान दृष्टान्त दर्पण के सामने जो होगा , दर्पण उसकी क्षवि दर्शायेगा , यह दर्पण का स्वभाव है । दर्पण में क्षवि की अभिव्यक्ति मात्र है । उस क्षवि से दर्पण पूर्णतया असंग होता है । सामने की वस्तु हट गयी , फिरभी दर्पण को कोई अन्तर नहीं होता है । मस्तिष्क में आत्मा की केवल अभिव्यक्ति मात्र है । यह अभिव्यक्ति ही विभक्त होकर अहंकार और विषय-वस्तु बन जाते हैं । कैसे ? वस्तुरूपबोध व्यक्ति को होता है , इस बोध में दो भाग हैं एक- यह वस्तुरूप है और दो- यह वस्तुरूप मैं नहीं हूँ , द्वैत सृजित हो गया , वस्तुरूप द्वैत का पहला पक्ष और मैं(अहंकार) द्वैत का दूसरा पक्ष है । यही विषय-विषयी का द्वैत है । इस द्वैत के दोनो अवयव विषय और विषयी दोनो मिथ्या हैं । मिथ्या की परिभाषा की जाती है , जो है नहीं उसकी अनुभूति को मिथ्या कहा जाता है । दर्पण में जनित प्रतिबिम्ब का क्या कोई अस्तित्व होता है । उपरोक्त कथित आत्मा की अभिव्यक्ति को सत्य की मान्यता ही , देहात्मभाव है । यह भाव ही व्यक्ति को अपनी आत्मा से दूर कर देता है । आत्मा अद्वय तत्व है । द्वैत दर्शन भ्रामक है । परन्तु सम्पूर्ण लोकव्यवहा...