रामलीला कृष्णलीला
शिक्षण-विधि-सोपान
रामलीला कृष्णलीला यह जगत् रामलीला है । यह जगत् कृष्णलीला है । यह जगत् सत्ता और शक्ति की लीला
है । उपरोक्त लीला के दो कथानक, प्रथम-
इदं द्वितीयं अहं हैं । इदं अर्थात् अहं से अतिरिक्त सकल जड और जीव हैं । सत्ता असंग, निराकार अद्वयं है । शक्ति विकारी है । शक्ति का प्रथम विकार
हिरण्यगर्भ है । यह वन जी है । द्वितीय चरण का विकारा,
पंचमहाभूत हैं । यह टू जी है । जहाँ केवल टू जी है, वह जगत् का जड प्रभाग है । जहाँ टू जी और वन जी दोनो हैं, वह जगत् का जीव प्रभाग है । जीव प्रभाग का भोक्तित्व, पुरुष की अभिव्यक्ति है,
अर्थात् दर्पण में प्रतीत होने वाली पुरुष की छाया क्षवि
है । उपरोक्त वर्णित जगत् के दोनो अवयव इदं और अहं मात्र अनुभूतियाँ हैं, जिनका कोई अस्तित्व नहीं है । उपरोक्त वर्णित इदं और अहं
के व्यापार में अर्जित होने वाली सम्पदायें राग-द्वेष,
काम-क्रोध, इच्छा-मोंह हैं । इन सम्पदाओं का भोक्ता,
वह प्रतीत होने वाला पुरुष जिसे अहंकार कहा जाता है । उपरोक्त
जगत् में किसका जन्म हो रहा है, किसकी
मृत्यु हो रही है ? कौन
क्या अर्जित कर रहा है ? किसकी
क्या सम्पदा है ? विचार
करने योग्य हैं । ..... क्रमश:
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