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आश्रय अभिव्यक्ति

शिक्षण-विधि-सोपान आश्रय अभिव्यक्ति आत्मा ज्ञान स्वरूप है । ज्ञान को प्रगट होने के लिये एक अभिव्यंजक की अपेक्षा होती है । ज्ञान की अभिव्यक्ति के लिये विषय की अपेक्षा है । ज्ञाता-ज्ञेय-ज्ञान की त्रिकुटी का उपरोक्त स्वरूप है । उपरोक्त वर्णित त्रिकुटी का ज्ञाता , मनुष्य मात्र ज्ञान की अभिव्यक्ति है । उपरोक्त वर्णित त्रिकुटी का ज्ञेय , विषय मात्र स्थिति की अभिव्यक्ति है । ज्ञाता और ज्ञेय दोनो ज्ञान के आश्रित हैं । इसलिये सापेक्ष हैं । उपरोक्त त्रिकुटी का ज्ञाता और ज्ञेय दोनो का विलय होने पर ही शुद्ध-ज्ञान का साक्षात् सम्भव है । ...... क्रमश:   

शिव शंकर प्रलयंकर

शिक्षण-विधि-सोपान शिव शंकर प्रलयंकर आत्मा का स्वरूप शिव है , उसका स्वभाव शंकर है , उसका प्रभाव प्रलयंकर है । सूर्य का स्वरूप प्रकाशपुंज है , प्रकाश रश्मियों को विकीर्ण करना उसका स्वभाव है , उर्जावितरण उसका प्रभाव है । आत्मा ज्ञान-स्वरूप है । प्रत्येक ज्ञान का आश्रय बनना , आत्मा का स्वभाव है । अज्ञान का क्षय , आत्मा का प्रभाव है । ...... क्रमश:    

अनिर्वचनीय

शिक्षण-विधि-सोपान अनिर्वचनीय आकाश में नीलमा होती नहीं है , परन्तु प्रत्येक व्यक्ति का नित्य का अनुभव है कि आकाश नीला दीखता है । जो वस्तु जिस अधिकरण में भासित हो रही है , वह उस अधिकरण में नहीं है । यह अनिर्वचनीयता है । अद्वैत-वेदान्त भासमानिता का निषेध नहीं करता है । जगत् भासित हो रहा है । परन्तु जगत् की भासमानिता आत्म-चैतन्य के अधिकरण में देखी जा रही है , जबकि आत्म-चैतन्य के अधिकरण में जगत् नहीं है । आत्मा चेतन है । जगत् जड है । चेतन में जड का होना कैसे सम्भव है । यह अनिर्वचनीयता है । अनिर्वचनीयता का अर्थ यह नहीं होता है कि वह वस्तु है नहीं अथवा उसका निर्वचन नहीं किया जा सकता है । वस्तु भासती है । उसके भासने का निर्वचन भी किया जाता है । परन्तु जिस अधिकरण में वह भास रही है , उस अधिकरण में वह नहीं है । यह अनिर्वचनीयता है । ...... क्रमश:  

अपने आभाव में दीखना

शिक्षण-विधि-सोपान अपने आभाव में दीखना जगत् की प्रत्येक वस्तु अपने आभाव में ही दीखती है । उपरोक्त अभिव्यक्ति की व्याख्या इस प्रकार है , जैसा कि पूर्व के लेख शीर्षक प्रत्यय में बताया गया था , किसी भी वस्तु-रूप का प्रत्यय मस्तिष्क में बनता है , आत्म-चैतन्य के उपरोक्त कथित प्रत्यय में व्याप्त होने पर ही , वस्तु-रूप-ज्ञान-बोध मस्तिष्क में सम्भव होता है । उपरोक्त विवरण में वस्तु-रूप-विषय का प्रत्यय भी आत्म-चैतन्य के आश्रय से ही सृजित हो रहा है , और वस्तु-रूप-ज्ञान-बोध-भी आत्म-चैतन्य के प्रत्यय में वेध से ही सम्भव होता है । उपरोक्त समस्त विवरण अनुसार जड-विषय-वस्तु-रूप का ज्ञान-बोध चैतन्य में हो रहा है , और निश्चय ही उस चैतन्य में वह विषय-जडता नहीं है । उपरोक्तानुसार यह कथन कि जगत् की प्रत्येक वस्तु अपने आभाव में ही दीखती है , अनिर्वचनीयता का आधार बनती है । ....... क्रमश:  

ज्ञान क्रिया इच्छा

शिक्षण-विधि-सोपान ज्ञान क्रिया इच्छा सत्व , रज़स , तमस यह तीन उपाधियाँ हैं जिनसे माया शक्ति को व्यक्त किया जाता है । सत्व में विभू: आत्मा का वेध होता हैं तो रूपबोध सम्भव होता है । रज़स में विभू: आत्मा का वेध होता है तो कर्म का उदय होता है । तमस में विभू: आत्मा का बेध होता है तो प्रज्ञा का आच्छादक सृजित होता है । व्यक्ति का अन्त:करण पंचमहाभूतों की तन्मात्राओं के चार-बटा-पाँच भाग सात्विक अंश द्वारा निर्मित है । इसलिये ही उसमें शब्द , स्पर्ष , रूप , रस , और गंध का अनुभव ज्ञान की क्षमता होती है । उपरोक्त कथित पंचमहाभूतों की तन्मात्राओं के शेष एक बटा पाँच सात्विक अंश से पंच ज्ञानेन्द्रियाँ निर्मित हैं । इसलिये ही मोंह का सृजन ज्ञान इन्द्रियों और मन दोनों के संयुक्त भागीदारी द्वारा सृजित होते हैं । ज्ञातव्य हैं कि मन की तीन मौलिक विकृतियाँ नामत: मल , विक्षेप , अज्ञान इन्ही उपरोक्त वर्णित प्रमाद , रज़स और सत्व के आच्छादन से सृजित होती हैं । ज्ञान जिज्ञासु को उपरोक्त के निवारण के पुरुषार्थ की अपेक्षा होती है । ....... क्रमश:  

द्वैतं भयं भवति

शिक्षण-विधि-सोपान द्वैतं भयं भवति शास्त्र में सिद्धान्त निरूपित किया गया है , दवैतं भयं भवति , यह सहज ग्राह्य होने लायक सिद्धान्त है । बाह्य जगत् के नाम-रूप वस्तु का ज्ञानबोध व्यक्ति के मन में दो रूपों में होता है । एक कि वहां एक अमुक-वस्तु है । दो- वह अमुक-वस्तु-रूप मैं नहीं हूँ , यही द्वैत का सृजन है । वस्तुरूप एक ही है , परन्तु उसके ज्ञानबोध की दो क्षवियां व्यक्ति के मन में एक साथ सृजित होती हैं । उपरोक्त वर्णित स्थिति ही , इदं और अहं का स्वरूपबोध , मन में सृजित होता है । यह मायाशक्ति की लीला का फल है । इदं , अहं को छोडकर , पूरा जगत् है । अहं , मन में आत्मा की प्रतिबिम्बात्मक अनुभूति है । उपरोक्त वर्णित इदं भी मायाकल्पित है और अहं भी मायाकल्पित है । विचार की अपेक्षा है , किसी भी घटवस्तु में , घटरूप तो मात्र अभिव्यक्ति है जिसका सत्य मृद है , उसी प्रकार दर्पण में अनुभव होने वाला प्रतिबिम्ब तो मात्र अनुभूति है जिसका कोई अस्तित्व नहीं है और यही अहं है । उपरोक्त वर्णित इदं और अहं के मध्य जो परस्पर व्यापार चल रहा है , वही लोकव्यवहार का मिथ्या जगत् है । यह जगत् माया की ...

उपाधि महात्म्य

शिक्षण-विधि-सोपान उपाधि महात्म्य व्यक्ति की शरीर का अन्नमयकोष , उसके प्राणमयकोष का अभिव्यंजक होता है , उसका प्राणमयकोष उसके मनोमयकोष का अभिव्यंजक होता है , उसका मनोमयकोष उसके विज्ञानमयकोष का अभिव्यंजक होता है , उसका विज्ञानमयकोष उसके आनन्दमयकोष का अभिव्यंजक होता है , उसका आनन्दमयकोष उसके अव्यक्त अर्थात् माया-शक्ति का अभिव्यंजक होता है , उसका अव्यक्त उसके आत्मा का अभिव्यंजक होता है । ज्ञानबोध यात्रा अर्थात् आत्मबोधयात्रा का उपरोक्त वर्णित क्रम है । स्थूलतम् अन्नमयकोष से प्रारम्भ कर सूक्ष्मतम् आत्मबोध पर्यन्त है । उपरोक्त ज्ञानयात्रा निषेध पथ से होती है । अन्नमयकोष के निषेध द्वारा प्राणमय की प्राप्ति है , प्राणमयकोष के निषेध द्वारा मनोमयकोष की प्राप्ति है , इसी क्रम से आत्मबोध पर्यन्त है । निषेध क्या है ? मिथ्यात्वनिश्चय निषेध है । मिथ्यात्व की अनेक परिभाषायें प्रसंग के अनुसार की गई है । प्राप्त प्रसंग में मिथ्या का अर्थ इस प्रकार ग्रहण करना अपेक्षित है । जिसकी स्थिति , बहुसंख्यक परिस्थितियों के आश्रय द्वारा सिद्ध होती है , वह मिथ्या है । ...... क्रमश: