उपादानिता
शिक्षण-विधि-सोपान
उपादानिता
कार्य-कारण के विचार में, प्रत्येक कार्य में कारण अनुश्र्यूत रहता
है । यह कारण की उपादानिता है । ब्रम्ह की उपादानिता का शास्त्र उपदेश भी करते हैं, और निषेध भी करते हैं । यह शिक्षण विधि है । ब्रम्ह अ-परिच्छिन्न है ।
यदि जगत् ब्रम्ह से भिन्न है, तो ब्रम्ह की अ-परिच्छिन्नता प्रश्नवाचक
हो जायेगी, इसलिये व्याख्या की जाती है कि ब्रम्ह
जगत् से अ-भिन्न है । भगवान आदिशंकर व्याख्या करते हुये कहते हैं कि दोनो अर्थात्
जगत् और ब्रम्ह दोनो की स्थिति केवल एक रूप में सम्भव हो सकती है, कि उपरोक्त में से एक सत्य है, एक भ्रान्ति है, ब्रम्ह तो श्रुति-प्रतिपादित सत्य है, अत: जगत् भ्रान्ति
है, इस प्रकार उपादानिता ही गौढ हो जाती है । यह माया का विज्ञान है । माया की
उपाधि से ब्रम्ह ईश्वर है । हिरण्यगर्भ की उपाधि से ब्रम्ह जगत् है । ..... क्रमश:
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