संदेश

तात्पर्य निर्णय

शिक्षण-विधि-सोपान तात्पर्य निर्णय वेदान्त के शिक्षण अवधि में , गुरू अद्वय-सत्य-तत्व का उपदेश करने की प्रक्रिया में , विभिन्न स्थलों पर कतिपय दृष्टान्तों का आश्रय लेते हैं । अद्वय तत्व पारलौकिक है । इसलिये लौकिक जगत के शब्द प्रमाण , अद्वय शुद्ध तत्व के उपदेश के लिये अक्षम होते है , अत: गुरू को दृष्टान्तों का आश्रय लेना अपरिहार्य बाध्यता होती है । यथा तत् त्वं असि यह शास्त्र उपदेश है । उपरोक्त दृष्टान्त में तत् पद अर्थात् ब्रम्ह , और त्वं पद अर्थात् आत्मा , दोनो ही अद्वय सत्य तत्व हैं , इनका निरूपण लौकिक व्यवहार के शब्द नहीं कर सकते हैं । अत: उपरोक्त वर्णित सत्य अद्वयं तत्वों को निरूपित करने के लिये गुरू दृष्तान्तों के आश्रय से , उपरोप्क्त अद्वय तत्वों को लखाते हैं । ऐसे दृष्टान्तों से जिज्ञासु को , गुरू द्वारा लखाये जा रहे अद्वय तत्वों पर्यन्त पहुँचने के लिये , गुरू के उपदेश के तात्पर्य का विवेक करने की मानसिक क्षमता की अपेक्षा होती है । इस प्रकार तात्पर्य निर्णय एक आवश्यक वाँक्षना है । ..... क्रमश:

गन्तव्य

शिक्षण-विधि-सोपान गन्तव्य लोकव्यवहार के जगत् के प्रत्येक व्यवहार में , कर्ता-कर्म-क्रिया , ज्ञाता-ज्ञेय-ज्ञान , दृष्टा-दृष्य-दृग का आश्रय और प्रकाशक ज्ञान-स्वरूप आत्मा की साक्षात् अपरोक्ष अनुभूति अन्तिम गन्तव्य है । ज्ञान-स्वरूप आत्मा के ज्ञान के उपरान्त कुछ भी जानने को शेष नहीं रह जाता है । आत्मा ही समस्त जगत् के जड वस्तु-रूपों का अस्तित्व है । आत्मा के आश्रय से ही समस्त ज्ञान है । आत्मा से ही समस्त जगत् की उत्पत्ति है , स्थिति है , और आत्मा में ही लय भी है । आत्म-चैतन्य ही अनन्त ब्रम्ह-चैतन्य है । आत्म-चैतन्य में ही समस्त जगत् भासित होता है । जो भासित हो रहा है , वह भी आत्मा ही है । उपरोक्त वर्णित तथ्य के विपरीत , लोकव्यवहार के पात्र जीव और जगत् के सत्यत्व की अनुभूति ही , भ्रान्ति है , अज्ञान है । लोकव्यवहार से प्रारम्भ कर आत्मा के साक्षात् अपरोक्ष अनुभूति पर्यन्त ज्ञान-यात्रा है । ...... क्रमश:    

सोपान-परिचय-सतत्

शिक्षण-विधि-सोपान सोपान-परिचय-सतत् सत्य-आत्मा और सत्य-ब्रम्ह यह दो भिन्न तत्व नहीं हैं , अपितु एक ही सत्य के दो नाम हैं । जब एक जीव के विचार में इस अद्वय सत्य-तत्व का निरूपण किया जाता है , तो इसे आत्मा शब्द द्वारा सम्बोधित किया जाता है । जब समष्टि के विचार में सत्य-अद्वय-तत्व का निरूपण किया जाता है , तो इसे ब्रम्ह शब्द द्वारा सम्बोधित किया जाता है । उपरोक्त वर्णित तथ्यात्मक अभिव्यक्ति ही चारो वेदों का सर्वोच्च ज्ञान शिक्षण है । आत्मा अथवा ब्रम्ह शब्द भी सच्चे अर्थों में उस असंग-निराकार-अनन्त सत्य-तत्व को निरूपित करने में अक्षम हैं । उस अद्वय सत्य का वास्तविक निरूपण “ मौन” होता है । उस अद्वय सत्य की परिभाषा अथवा अभिव्यक्ति , अ-सम्भव प्रयत्न है । वह अद्वय-सत्य स्वयं सिद्ध , स्व-प्रकाश है । उसके ज्ञान के लिये किसी अन्य ज्ञान के आश्रय की अपेक्षा नहीं है । “ मैं हूँ ” इस ज्ञान को , क्या किसी ने सिखाया है ? यह ज्ञान तो प्रत्येक जीव को जन्म से होता है । यही आत्म-ज्ञान है । परन्तु लोक-व्यवहार इतने से चलता नहीं है । तो व्यवहार चलाने में प्रत्येक व्यक्ति “ मैं हूँ ” के साथ बहुत कुछ...

सोपान-परिचय

शिक्षण-विधि-सोपान सोपान-परिचय शास्त्रों में ज्ञान का उपदेश प्रशस्थ करने की प्रक्रिया को स्थूल से सूक्ष्म को उन्मुख विधि द्वारा करते है । स्थूल का ज्ञान प्रत्येक को जन्म से होता है । इसलिये ज्ञात से अज्ञात की ओर शास्त्र जिज्ञासु को ले जाते है । उपरोक्त शिक्षण प्रक्रिया में शास्त्र अध्यारोप-अपवाद की विधि अपनाते हैं । प्रश्न उठेगा कि अध्यारोप क्या है ? उत्तर है, सत्य पर अ-सत्य का आरोपण अध्यारोप कहा जाता है । सत्य ब्रम्ह है । अ-सत्य यह माया-लोक है । नाम-रूप-कर्म रूपी यह कल्पित माया-लोक, सत्य-ब्रम्ह के ऊपर आरोपित है । इस प्रकार यह दृष्य-अनुभवगम्य-जगत्, सत्य-ब्रम्ह के ऊपर अध्यारोपित है । सत्य आपकी अपनी आत्मा है । यह स्थूल-सूक्ष्म-कारण-शरीर, आपकी सत्य आत्मा के ऊपर आरोपित है । इस प्रकार आपकी स्थूल-सूक्ष्म-कारण-शरीर आपकी सत्य-आत्मा के ऊपर अध्यारोपित है । सत्य का ज्ञान न होना, अज्ञान है । अज्ञान के फल से, सत्य के स्थान पर किसी कल्पित अ-सत्य को सत्य मान लेना, अध्यास कहा जाता है । भोज्य-जगत् में सत्य-ब्रम्ह का अज्ञान, भोक्ता-जीव में सत्य-आत्म-स्वरूप का अज्ञान, अज्ञान है । उपरोक्त कथित भोक्ता...

माया का लक्षण कार्य-कारण

माया-कल्पित-जगत्-सोपान माया का लक्षण कार्य-कारण पद हैं , पदार्थ हैं । पद नाम हैं , पदार्थ रूप हैं । यही नाम और रूप मिलकर माया-लोक है । इसी माया लोक में भोक्ता जीव , भोज्य जगत् के साथ व्यवहार-रत् है । उपरोक्त कथित व्यवहार में , भोक्ता जीव प्रत्येक , कार्य रूपी रूप का कारण निर्धारित करता है । यह कार्य-कारण-जगत् है , जिसमें जीव कारण बनता है , रूप उसका कार्य होता है । जीव स-अधिकार कहता है , कि यह मैंने बनाया है । क्या बनाया है ? वही रूप बनाया है । यही माया है । कार्य भी भ्रान्ति मात्र है । कारण भी भ्रान्ति मात्र है । फिरभी लोकव्यवहार है । जीव की उत्पत्ति का कारण , उसके पूर्व के संचित पाप-पुण्य का भोग होता है । कारण-शरीर से कार्य रूपी सूक्ष्म-स्थूल-शरीर उत्पन्न होती है । पाप-पुण्य-कार्य हैं , कारण कर्ता जीव है । यह माया लोक है । उपरोक्त को ही शास्त्र मिथ्या जगत् कहते हैं । यह कार्य-कारण जगत् का स्वरूप ही माया का तीसरा लक्षण है । ..... क्रमश:    

माया का लक्षण काल

माया-कल्पित-जगत्-सोपान माया का लक्षण काल काल क्या है ? विद्वान काल का उद्भव श्रोत परिवर्तन बताते हैं । काल अर्थात् परिवर्तन है । परिवर्तनो का न ही ओर है , और न ही छोर है । जिसका न ओर है न छोर है , वह माया है । परिवर्तन माया है । अ-निर्वचनीय माया है । माया की प्रकृति परिवर्तन है । माया-लोक का प्रत्येक अवयव परिवर्तन से आक्रान्त है । जन्म है , मृत्यु है । दोनो ही परिवर्तन मात्र हैं । स्त्री के गर्भ में स्थित भ्रूण परिवर्तित होकर , शिशु है । शिशु ही परिवर्तनो के द्वारा किशोर , युवा , प्रौढ , वृद्ध और अन्तिम परिवर्तन मृत्यु है । यह सभी परिवर्तन मात्र माया है । उपरोक्त समस्त में तात्विक कुछ भी नहीं है । फिरभी लोक है , लोकव्यवहार है । यही माया-लोक है । माया की उत्पत्ति , आत्मा के संकल्प मात्र से हो जाती है । यह प्रत्येक व्यक्ति का नित्य का अनुभव है । केवल व्यक्ति अपने को और अपने लोक को , विश्लेषणात्मक ढंग से कभी विचार नहीं करता है । काल , माया का दूसरा लक्षण है । ..... क्रमश:

माया का लक्षण आकाश

माया-कल्पित-जगत्-सोपान माया का लक्षण आकाश आकाश क्या है ? विद्वान आकाश की परिभाषा करतें हैं , कि जो अवकाश देता है वह आकाश है । अवकाश अर्थात् रहने का स्थान है । आकाश सर्वत्र है । सम्पूर्ण जगत् आकाश में स्थिति है । जीव रहने के लिये घर बनाता है । घर क्या है ? आकाश है । आकाश में ही कुछ दीवारें बना लेता है । दीवारों के ऊपर छत बना लेता है और उसे ही घर कहता है । इन दीवारों के अन्दर और बाहर समस्त आकाश है । आकाश का न ही ओर है , न ही छोर है । यह माया है । जिसका न ओर है , न छोर है । आत्मा के संकल्प मात्र से , आकाश अर्थात् माया उपस्थित हो जाती है । पुन: इसी आकाश से आगे की समस्त सृष्टि यथा वायु-अग्नि-जल-पृथ्वी-औषधय:-अन्नं-प्रजा प्रगट हो जाते है । आकाश , यह माया लोक का प्रथम लक्षण है । ...... क्रमश: