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विज्ञानात्मा

माया-कल्पित-जगत्-सोपान विज्ञानात्मा जीवात्मा , को ही शास्त्रों में विज्ञानात्मा कहा जाता है । चिदाभास द्वारा पोषित जीव की जीवात्मा विज्ञानात्मा है । उपाधियुक्त आत्मा जीवात्मा है । आत्मा एक है जो कि निराकार है , असंग है , अनन्त है , सर्व-विभू: है । परन्तु अज्ञान के फल से जब उपरोक्त कथित सर्व-विभू: आत्मा को , अहंकार से अलंकृत किसी स्थूल-सूक्ष्म-शरीर विषेस के गुण-धर्मों के साथ जोडा जाता है , तब जीवात्मा शब्द का प्रादुर्भाव होता है । ..... क्रमश:

चिदाभास

माया-कल्पित-जगत्-सोपान चिदाभास स्थूल-सूक्ष्म-शरीर के अंत:करण में परिलक्षित होने वाला चैतन्य अहंकार है । उपाधियुक्त आत्मा जीवात्मा है । आत्मा एक है जो कि निराकार है , असंग है , अनन्त है , सर्व-विभू: है । परन्तु अज्ञान के फल से जब उपरोक्त कथित सर्व-विभू: आत्मा को , अहंकार से अलंकृत किसी स्थूल-सूक्ष्म-शरीर विषेस के गुण-धर्मों के साथ जोडा जाता है , तब जीवात्मा शब्द का प्रादुर्भाव होता है । शास्त्रों में अहंकार जिसकी परिभाषा उपरोक्त वर्णित है , को चिदाभास शब्द द्वारा व्यक्त किया गया है । ...... क्रमश:  

जीव

माया-कल्पित-जगत्-सोपान जीव ज्ञानेन्द्रिया के पीछे अनुभव करने वाला , तथा कर्मेन्द्रियों के पीछे कार्म करने वाला चिदाभास-युक्त चेतन पुरुष जीव है | जीव दृष्टा , स्प्रष्टा , श्रोता , घ्राता तथा रसयिता है । जीव कर्ता है । जीव मनन-कर्ता है । जीव स्मरण कर्ता है । मनुष्य-जीव विवेक कर्ता भी है । जीव अहंकार कर्ता है । जीव धर्म-पुरुषार्थ कर्ता है । जीव अर्थ-पुरुषार्थ कर्ता है । जीव काम-पुरुषार्थ कर्ता है । जीव मोक्ष-पुरुषार्थ कर्ता है । ..... क्रमश:  

समष्टि-स्थूल-विराट

माया-कल्पित-जगत्-सोपान समष्टि-स्थूल-विराट उपनिषदों में ईश्वर के तपस का वर्णन है । ईश्वर का तपस , सूक्ष्म का मानसिक योजन है , जगत् के स्वरूप का पूर्व-नियोजन है । उपरोक्त कथित जगत् के पूर्व-नियोजित स्वरूप को , माया शक्ति अनुभवगम्य जगत् के स्थूल-रूप में प्रक्षेपित करती है । सूक्ष्म से स्थूल अस्तित्वमान होता है । सूक्ष्म-हिरण्यगर्भ से स्थूल-विराट प्रगट होता है । समस्त दृष्य अनुभवगम्य जगत् के सकल-जड-प्रपंच और सम्पूर्ण-जीव-प्रपंच विराट-देवता के नाम से प्रख्यात हैं । ....... क्रमश:   

समष्टि-प्राण-हिरण्यगर्भ

माया-कल्पित-जगत्-सोपान समष्टि-प्राण-हिरण्यगर्भ समष्टि प्राण अर्थात् सम्पूर्ण जगत् के समस्त जीव प्रपंचों की संकलित जीवन-शक्ति , हिरण्यगर्भ हैं । कारण-ईश्वर-विष्णु पुरुष की छाया सदृष्य उत्पत्ति हिरण्यगर्भ-देवता हैं । उपरोक्त कथित शास्त्र उपदेश की व्याख्या इस प्रकार है । कारण-ईश्वर के संकल्प मात्र से माया शक्ति क्रियाशील होकर कारण की छाया प्राण का प्रक्षेपण उपस्थित करती है । संकलित-संचित-कर्म-फल-कारण की छाया अभिव्यक्ति प्राण-शक्ति है । उपरोक्त कथित प्राण का अन्त:करण मन अर्थात् संकल्प-विकल्पात्मक-वृत्ति-स्थल , कारण-संचित-कर्म-फल का साकार-व्यक्त-अभिव्यक्ति है । उपरोक्त कथित हिरण्यगर्भ पिण्ड को माया-शक्ति प्रातिभासित चैतन्य जिसे शास्त्र चिदाभास शब्द द्वारा व्यक्त करते है , द्वारा क्रियाशील करती है । ...... क्रमश:   

समष्टि-कारण-विष्णु

माया-कल्पित-जगत्-सोपान समष्टि-कारण-विष्णु समष्टि कारण अर्थात् सम्पूर्ण जगत् के समस्त जीव प्रपंचों के संकलित सम्पूर्ण संचित कर्म-फल , समाहित दशा में अर्थात् अ-व्यक्त-दशा में , समष्टि-कारण-देवता-विष्णु में अर्थात् माया सहित ब्रम्ह में विद्यमान रहते है । उपरोक्त वर्णित स्थिति जगत् के लय काल की क्षवि है । उपरोक्त विवरण में विषेस ज्ञातव्य है कि संकलित सम्पूर्ण संचित कर्म-फल की धारक माया शक्ति होती है । उपरोक्त कथित रूप में माया शक्ति जगत्-वृक्ष का बीज़ है । ..... क्रमश:  

अन्त:करण लय कारण अवस्था

माया-कल्पित-जगत्-सोपान अन्त:करण लय कारण अवस्था सुशुप्ति काल अवधि में , व्यक्ति के मस्तिष्क का चारो प्रभाग , नामत: संकल्प-वृत्ति-प्रभाग अर्थात् मन , निश्चयात्म-वृत्ति-प्रभाग अर्थात् बुद्धि , चित्त-प्रभाग अर्थात् स्मृति-संचय-स्थल , एवं अहंकार प्रभाग , सभी अ-कार्यकारी दशा में , लय की स्थिति-प्राप्त को होते हैं । उपरोक्त कथित दशा में समस्त विषेस-ज्ञान , निर्विषेस-ज्ञान में , लय की दशा में अर्थात् समाहित दशा में रहते हैं । उपरोक्त-कथित् मस्तिष्क की लय की दशा ही कारण-दशा होती है । उपरोक्त कथित विवरण अनुसार , व्यक्ति का जागृत-दशा का मस्तिष्क ही , सुशुप्ति-दशा में , कारण-दशा होता है । उपरोक्त कथित का विलोम अर्थात् व्यक्ति की कारण-दशा ही पर्णित होकर जागृत-दशा का मस्तिष्क होता है । ज्ञातव्य है कि कारण-शरीर अर्थात् संचित-कर्म-फल , प्रत्येक व्यक्ति का , प्रत्येक जीव का , भिन्न होता है , इसीलिये प्रत्येक व्यक्ति का मस्तिष्क भिन्न होता है , स्वभाव भिन्न होता है । यह माया-कल्पित-जगत् अति-विलक्षण माया-विज्ञान का फल है । ....... क्रमश: