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मस्तिष्क के सन्सकार : चरण 3

पद-परिचय-सोपान मस्तिष्क के सन्सकार : चरण 3 मस्तिष्क में विद्यमान चैतन्य की क्षवि एक का स्पष्ट और विलक्षण स्मरण रखते हुये , यात्रा के चरण तीन में प्रवेष करते है । मस्तिष्क की क्रिया पद्धति की ओर ध्यान निवेदित है । मस्तिष्क चैतन्य की क्षवि एक के फल से प्रमाता स्वरूप में क्रियाकारी दशा में है । इस मस्तिष्क में घट-वृत्ति के फल से घट-स्वरूप का ज्ञान बोध होता है , और पट-वृत्ति के फल से उसे पट-रूप का ज्ञान बोध होता है , इसी क्रम का विस्तार करते हुये उपरोक्त कथित प्रमाता मस्तिष्क को अब मस्तिष्क में विद्यमान चैतन्य की क्षवि दो का ज्ञान-बोध करना है , तो कैसे होगा ? उत्तर होगा कि चैतन्य की क्षवि-दो के वृत्ति-बोध द्वारा सम्भव होगा , उचित उत्तर है । अब नया प्रश्न सृजित होता है कि चैतन्य की क्षवि दो तो निराकार है इसलिये इसकी वृत्ति क्या है ? इस प्रश्न को समझने पर्यन्त ही मस्तिष्क के सन्सकार : चरण 3 की इति है | ....... क्रमश:  

मस्तिष्क के सन्सकार : चरण 2

पद-परिचय-सोपान मस्तिष्क के सन्सकार : चरण 2 मस्तिष्क में विद्यमान चैतन्य की दोनो क्षवियों को स्पष्ट और विलक्षण दो स्वरूपों में अनुभव करते हुये , लक्ष्य भेद के चरण दो में प्रवेष कर रहें हैं । यात्रा में पहले हम उपरोक्त कथित दो क्षवियों में से पहले , क्षवि एक का विस्तृत अवलोकन करते हैं । यह क्षवि मस्तिष्क के तीन अवस्थाओं यथा जागृत-स्वप्न-सुशुप्ति प्रत्येक तीन में विद्यमान और प्रभावी रूप से क्रियाशील होती है । जागृत-दशा में इसके प्रभाव से मस्तिष्क बाह्य जगत् के स्थूल नाम-रूप-कार्य के साथ व्यवहार करता है , स्वप्न-दशा में इसके प्रभाव से मस्तिष्क अपने ही अन्दर विद्यमान वासना वृत्तियों के साथ व्यवहार करता है , और सुशुप्ति दशा में मस्तिष्क स्वयं , चूँकी लय की दशा में होता है , इसलिये इसका कोई व्यवहार नहीं होता है , परन्तु विचारगत्-चैतन्य विद्यमान और क्रियाशील दशा में रहता है । चैतन्य की पहली क्षवि को , यथा वर्णित उपरोक्त को आत्मसात् करने पर्यन्त ही , चरण 2 की इति है ।...........क्रमश:   

मस्तिष्क के सन्सकार : चरण 1

पद-परिचय-सोपान मस्तिष्क के सन्सकार : चरण 1 जैसा कि संस्कार का परिचय गत अंक में कराया गया , उसकी पुनरावृत्ति न करते हुये , सबसे पहले तो विचार इस बात का करना है कि , वह कौन सी वृत्तियाँ हैं जिनकी मस्तिष्क में गति को , मस्तिष्क का सामान्य अभ्यास बनाना है । उपरोक्त कथन को सरल ढंग से कहा जा सकता है कि मस्तिष्क के संस्कार का लक्षित विषय क्या है ? उत्तर है , आत्मस्वरूप । अब प्रश्न और पीछे चला जाता है , कि आत्मस्वरूप क्या है ? इस उत्तर से यात्रा का चरण 1 शुरू हो रहा है , मस्तिष्क के पटल पर चैतन्य की दो क्षवियाँ विद्यमान हैं , एक चैतन्य जो मस्तिष्क में परिलक्षित हो रहा है जिसके फल से यह जड-वस्तु-निर्मित-मस्तिष्क चेतन हो गया है , दो चैतन्य जो मात्र मस्तिष्क में गति कर रही वृत्तियों का साक्षी है । मस्तिष्क के संस्कार प्रकरण का पहला चरण , उपरोक्त वर्णित चैतन्य की यथा-वर्णित-उपरोक्त को स्पष्ट और विलक्षण दो क्षवियों के रूप में निर्धारण और स्मरण है । ...........क्रमश:  

मस्तिष्क का सन्सकार

पद-परिचय-सोपान मस्तिष्क का सन्सकार मस्तिष्क के सन्चालन के नियंत्रण , का सन्सकार अर्थात् सामान्य अभ्यास बन जाना है । मस्तिष्क वृत्तियों के प्रवाह के स्थल का नाम है । इस प्रकार मस्तिष्क का संचालन के नियंत्रण का सन्सकार अर्थात् मस्तिष्क में गति करने वाली वृत्तियों का नियन्त्रण है । गति करने वाली वृत्तियां अत सूक्ष्म होती हैं । इसलिये ही यह विषय गूढ बताया जाता है । एक काल विषेस में , विषेस प्रकार की वृत्तियाँ ही मस्तिष्क में गति करे , यह मस्तिष्क का सन्सकार है । उपरोक्त कथित सन्सकार , नियन्त्रण के फल से सम्भव है । यह नियन्त्रण जब मस्तिष्क का सामान्य अभ्यास बन जाय तब यह मस्तिष्क का सन्सकार है । उपरोक्त समस्त विवरण से स्पष्ट है कि यह प्रकरण सूक्ष्म और गूढ है । कोई चिन्ता की बात नहीं है । कार्य कितना भी गूढ क्यों न हो , उचित विधि और दृढ निष्ठा द्वारा सम्भव हो जाता है । इसलिये विषय में प्रवेष के उपरान्त अब विषय को खण्डो में विभक्त करके एक एक चरण आगे के अंको में इसका निराकरण और लक्ष्य की उपलब्धि पर्यन्त की यात्रा प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया जा रहा है | ........ क्रमश:

निरुपाधिक-प्रेम

पद-परिचय-सोपान निरुपाधिक-प्रेम शास्त्रॉ का स्पष्ट आदेश है कि , प्रत्येक व्यक्ति केवल अपनी आत्मा से ही प्रेम करता है । समस्त अनात्मन के प्रति प्रेम केवल व्यक्ति दिखावा के लिये करता है । दिखावा किसी अन्य को भ्रम में रखने के लिये करता है । अनात्मन के प्रति व्यक्ति का प्रेम किसी विशेष परिस्थिति अथवा किसी अन्य प्रयोजन की पूर्ति हेतु करता है । उपरोक्त के विपरीत व्यक्ति का अपनी आत्मा के प्रति प्रेम सर्वकालिक होता है , प्रत्येक परिस्थिति में होता है । अनात्मन के प्रति प्रेम का दिखावा भी व्यक्ति अपनी आत्मा के प्रति प्रेम के लिये ही करता है । ..... क्रमश:

जगत्-अधिष्ठान-ईश्वर

पद-परिचय-सोपान जगत्-अधिष्ठान-ईश्वर समस्त वस्तु-रूप के सत्यत्व का आधार निराकार ईश्वर , यह भक्ति की चर्मोत्कर्ष स्थिति है । यह अद्वैत वेदान्त का निरूपण है । यही कारण है कि अद्वैत वेदान्ती सहर्ष एक-रूप ईश्वर और बहुरूप ईश्वर की भी उपासना करता है । प्रेम के समर्पण के लिये उच्च सिद्धान्त ईश्वर की मानसिक ग्राह्यता के आधार पर विभाजन , भक्ति की श्रेणी के रूप में जाना जाता है । जगत् के सत्यत्व के अधिष्ठान रूप में ईश्वर का स्वरूप , यह भक्ति की पराकाष्ठा स्थिति है । ..... क्रमश:

जगत्-कारण-ईश्वर

पद-परिचय-सोपान जगत्-कारण-ईश्वर जब भी जगत्-कर्ता ईश्वर का विचार किया जाता है , तत्-समय जगत् के उपादान कारण का विचार सम्मुख हो जाता है । जगत् के उपादान कारण के रूप में भी ईश्वर को ही निर्धारित किया जाता है । यह बहुरूप जगत् ईश्वर की ही अभिव्यक्ति है । बहु-रूप ईश्वर , यह भक्ति का उत्तरोत्तर उच्च मानसिक ग्राह्यता की स्थिति है । सर्व-रूप-जगत् अर्थात् विराट , सर्वजीव-जगत्-प्रपंच-हिरण्यगर्भ , सर्व-कारण-रूप ईश्वर विष्णु की अभिव्यक्ति है । बहुरूप ईश्वर भक्ति है । ..... क्रमश: