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संकल्प-विकल्प-निवारण चरण 2

पद-परिचय-सोपान संकल्प-विकल्प-निवारण चरण 2 मनुष्य का मस्तिष्क ही उसका मित्र भी होता है और उसका शत्रु भी होता है । एक वृत्ति परम्परा जन्म से संचरित हो रही है । समय विषेस पर उपरोक्त कथित वृत्ति परम्परा को अनुपयुक्त पाये जाने पर , उसे निर्मूल कर , एक भिन्न वृत्ति की स्थापना का अवसर उपस्थित होता है । उपरोक्त कथित स्थिति में , पूर्व से व्यव्हृत-वृत्ति-परम्परा और नवीन प्रस्तावित वृत्ति के मध्य , एक परस्पर द्वंद की स्थिति , व्यक्ति के मस्तिष्क में क्रियाशील हो जाती है । उपरोक्त कथित द्वंद की स्थिति का , मानसिक-चिन्तन और विवेक की मध्यस्थता द्वारा , शमन करना ज्ञान प्रक्रिया का द्वितीय चरण है । ...... क्रमश:  

स्व-स्वरूप-धारण चरण 1

पद-परिचय-सोपान स्व-स्वरूप-धारण चरण 1 ज्ञान सम्भावना का केवल एक पथ , ज्ञान को स्व-स्वरूप में धारण करना , है । अज्ञान का निवारण , शास्त्र उपदेश को , दीर्घ अवधि पर्यन्त , क्रमिक शिक्षा-पद्धति द्वारा , गुरू के सानिध्य में रहकर , निष्ठापूर्ण श्रवण द्वारा होता है । अज्ञान के निवारण मात्र से व्यक्ति को ज्ञान का शाश्वत् स्वरूप बोध , व्यक्ति में व्याप्ति-बोध के रूप में उदय होती है । उपरोक्त वर्णित स्थिति स्व-स्वरूप-धारण का प्रथम चरण मात्र है । ...... क्रमश:

ज्ञान-प्राप्ति

पद-परिचय-सोपान ज्ञान-प्राप्ति ज्ञान व्यक्ति का स्वरूप है । इसलिये ज्ञान-प्राप्ति एक भ्रामक अभिव्यक्ति है । यह कोई उपलब्धि अथवा अवसर नहीं है । व्यक्ति अपने स्वरूप से अनभिज्ञ है । व्यक्ति की अपने स्वरूप की अनभिज्ञता का निवारण ही ज्ञान है । अत: ज्ञान अर्थात् आत्म-स्वरूप को स्व के रूप में धारण करना ही ज्ञान है । उपरोक्त वर्णित ज्ञान को स्व-स्वरूप धारण करने की प्रक्रिया को , विद्वान आचार्य-गणों ने तीन चरणों में विभक्त करके जिज्ञासु को ग्राह्य कराने की चेष्टा करते हैं । उपरोक्त कथित प्रत्येक तीन चरण का परिचयात्मक उल्लेख आगे के तीन अंको में प्रस्तुत किया जायेगा , अनुसरण निवेदित है । ..... क्रमश:

तीनो योग आवश्यक

पद-परिचय-सोपान तीनो योग आवश्यक किसी भी ज्ञान-जिज्ञासु के लिये तीनो ही योग नामत: कर्म-योग , उपासन-योग , ज्ञान-योग का अभ्यास अनिवार्य है । अधिक स्पष्ट करते हुये , तीनो योग वैकल्पिक नहीं हैं अपितु तीनो ही मिलकर एक पूर्ण स्थिति हैं । प्रथम दो कर्म-योग और उपासन-योग तैयारी है , अन्तिम ज्ञान-योग उपलब्धि है । ज्ञान-प्रक्रिया मस्तिष्क की उत्कृष्ट दशा की प्राप्ति है । इसलिये मस्तिष्क के परिमार्जन से प्रारम्भ करके विकसित दशा से मार्गी होते हुये उत्कृष्ट पर्यन्त की यात्रा है । अज्ञान भ्रमित मस्तिष्क की दशा है । ज्ञान शाश्वत् उत्कृष्ट सक्षम विकसित मस्तिष्क की दशा है । ..... क्रमश:

तीन धर्म का विनय

पद-परिचय-सोपान तीन धर्म का विनय आत्म-ज्ञान का जिज्ञासु ईश्वर से तीन मानसिक धर्म की याचना करता है । एक , हे ईश्वर मुझे इस जगत् की जो अ-परिवर्तनीय स्थितियाँ हैं , उन्हे यथा स्वरूप स्वीकार करने की मानसिक क्षमता प्रदान करें प्रभूजी । दो , इस जगत् में जो कुछ परिवर्तित होने योग्य स्थितियाँ है , उन्हे परिवर्तित करने का साहस दो प्रभूजी । तीन , इस जगत् में क्या अपरिवर्तनीय स्थितियाँ हैं , और क्या परिवर्तनीय स्थितियाँ है , इनका भेद जानने का विवेक दें प्रभूजी । ...... क्रमश

गूढता का रहस्य

पद-परिचय-सोपान गूढता का रहस्य आत्मा सूक्ष्म तत्व है । व्यक्ति को अनुभव-ज्ञान के लिये उपलब्ध पांच ज्ञानेन्द्रियां केवल बाह्य जगत् के वस्तु-रूप-ज्ञान के लिये योग्य प्रमाण हैं । आत्मा ज्ञान-विषय है । आत्मा किसी भी दशा में प्रमेय नहीं बन सकता है । इसलिये आत्मा की प्रमा , ज्ञानेन्द्री प्रमाण द्वारा सम्भव नहीं हो सकती है । उपरोक्त कथित कारण से आत्म-ज्ञान-गूढ है । जिस प्रकार आँखे समस्त बाह्य जगत् को देख सकती हैं परन्तु स्वयं अपने को नहीं देख सकती हैं । उसी प्रकार प्रमाता समस्त बाह्य जगत् का अनुभव करता है परन्तु स्वयं अपने स्वरूप का अनुभव नहीं कर सकता है । स्वयं अपनी आँखों को देखने के लिये एक बाह्य सिद्धान्त , दर्पण का आश्रय लेना पडता है । उसी प्रकार आत्मा के ज्ञान के लिये शास्त्र प्रमाण , जो कि दर्पण का कार्य करते हैं , के आश्रय से ही सम्भव हो सकता है । ..... क्रमश:

आत्म-ज्ञान

पद-परिचय-सोपान आत्म-ज्ञान शास्त्र समस्त अनुभवगम्य जगत् को अनात्मन कह कर निषेध करते हैं । प्रश्न उत्पन्न होता है कि , अनुभवगम्य से परे क्या है ? उत्तर है , स्वयं अनुभवकर्ता अनुभवातीत है । अनुभवकर्ता को बाह्य जगत् का अनुभव सम्भव है परन्तु स्वयं अपना अनुभव वह अनुभवकर्ता नही कर सकता है । यह माया-कल्पित सृष्टि की मौलिक सीमा है । माया सृष्टि की विलक्षणता है । पुन: प्रश्न सृजित होता है कि आत्म-ज्ञान क्या है ? प्रारम्भिक अवस्था में , अज्ञान के निवारण , को आत्म-ज्ञान के रूप में ग्रहण करना है । आत्मज्ञान सूक्ष्म-गूढ विषय है । क्रमिक दीर्घ-कालीन शिक्षण द्वारा सम्भव होता है । ..... क्रमश: