संदेश

पंच-महाभूत

पद-परिचय-सोपान पंच-महाभूत सृष्टि प्रक्रिया में सबसे पहले पाँच मौलिक जड पदार्थ नामत: आकाश , वायु , अग्नि , आपा , पृथ्वी की उत्पत्ति हुई है । उपरोक्त पाँच मौलिक जड पदार्थ ही पँच-महाभूत के नाम से विख्यात हैं । उत्पत्ति प्रक्रिया में पहले सूक्ष्म-पँच-महाभूतों की उत्पत्ति हुई है । पुन: सूक्ष्म-पँच-महाभूतों के पंचीकरण द्वारा स्थूल-पंचमहाभूतो का सृजन हुआ है । उपरोक्त पांच मौलिक जड स्थूल-पंच-महाभूतो के विभिन्न अंशों में समन्वय द्वारा सम्पूर्ण जगत् के स्थूल-जड-प्रपंच सम्भव हुआ है । उपरोक्तानुसार जगत् के समस्त सूक्ष्म-जड-प्रपंचों की उत्पत्ति सूक्ष्म-पंच-महाभूतो द्वारा सम्भव हुई है और जगत् के समस्त स्थूल-जड-प्रपंचों की उत्पत्ति का मूल स्थूल-पंच-महाभूत हैं ।   इस स्थल पर ज्ञेय है कि चेतन जीव-प्रपंचॉ की सूक्ष्म-शरीर सूक्ष्म-पंच-महाभूतों द्वारा बनी हुई है और स्थूल-शरीर स्थूल-पंच-महाभूतों द्वारा ही बनी हुई है ....... क्रमश:

व्यष्टि-समष्टि

पद-परिचय-सोपान व्यष्टि-समष्टि एक व्यक्ति को आधार बनाकर किया जाने वाला विचार व्यष्टि है । सम्पूर्ण जगत् को आधार बनाकर किया जाने वाला विचार समष्टि है । प्रकृति का संचालन लक्ष्य समष्टि के लिये होता है । प्रकृति व्यष्टि को समष्टि के अंग के रूप में ग्रहण करती है । इस प्रकार स्वाभाविक न्याय स्वरूप में प्रत्येक व्यष्टि समष्टि का अन्श है । प्रत्येक व्यष्टि में समष्टि विद्यमान रहती है । उपरोक्त कथित न्याय को स्वीकारने वाला व्यक्ति स्वाभाविक अनुकूलता का भोग करता है । उपरोक्त कथित न्याय का उलंघन करने वाला व्यक्ति संघर्ष की स्थिति का सामना करता है ........ क्रमश:

कर्म-कर्मफल

पद-परिचय-सोपान कर्म-कर्मफल कर्मों की कर्ता प्रकृति है यह प्रकृति का संविधान है । इस संविधान का सहज़ अर्थ है कि जीव केवल प्रकृति का प्रतिनिधि है । प्रतिनिधि के रूप में जीव को वही कर्म करना अपेक्षित है , जो कि प्रकृति की अपेक्षानुसार है । परन्तु जीव उपरोक्त वर्णित अपेक्षा का उलंघन करते हुये स्वयं की इच्छा-पूर्ति के कर्म भी करता है । उपरोक्त कथित इच्छा-पूर्ति के लिये किये गये कर्म से जो कर्म-फल जनित होते हैं , जीव उन कर्म-फलों का बाध्य भोक्ता होता है । उपरोक्त कथित इच्छा-पूर्ति के कर्मों द्वारा सृजित कर्म-फलो के संचित भण्डार का भोग कराने के लिये ही इस जगत् की उत्पत्ति होती है । परन्तु आपका स्वरूप आपकी आत्मा न ही कर्ता है , और न ही भोक्ता है .......... क्रमश:    

भोक्ता-भोज्य

पद-परिचय-सोपान भोक्ता-भोज्य भोक्ता अर्थात् विषय होता है । भोज्य अर्थात् वस्तु होता है । भोक्ता अर्थात् अनुभव-कर्ता है । भोज्य अर्थात् अनुभव किया जाने वाला वस्तु-रूप-जगत् है । यह व्यवहारिक जीवन चेतन जीव और अचेतन जगत् के मध्य क्रिया-प्रतिक्रिया है । इस जगत् का जीव भोक्ता है , और जगत् भोज्य है । भोक्ता व्यक्ति अपने समस्त अनुभव इसी भोज्य जगत् से अर्जित करता है । व्यक्ति के लिये यह जगत् अनुभव-ग्रहण-स्थल है । अनुभव-भोग वह भोक्ता-व्यक्ति (स्थूल-शरीर-मस्तिष्क-समुदाय) अपने पूर्व-जन्मों के संचित कर्मफलो के भोग की प्रक्रिया में करता है और यह जगत् जीव (स्थूल-शरीर-मस्तिष्क-समुदाय) के संचित-कर्म-फलो को भोग प्रदान करने का स्थल है । कर्म (यज्ञ) के प्रकरण में स्थिति भिन्न होती है । यज्ञ-कर्म , जीव (स्थूल-शरीर-मस्तिष्क-समुदाय) देवताओं की तुष्टि के लिये करता है । इस प्रकार कर्म (यज्ञ)   के प्रकरण में देवता भोक्ता होता है , और कर्म करने वाला व्यक्ति भोज्य होता है । परन्तु आप का स्वरूप अर्थात् आपकी आत्मा न ही भोक्ता है और न ही भोज्य है ........... क्रमश:  

त्रिकुटी

पद-परिचय-सोपान त्रिकुटी प्रमाता-प्रमाण-प्रमेय , कर्ता-करण-कार्य इन्हें त्रिकुटी कहा जाता है । इनमें प्रत्येक अवयव का परिचय इस प्रकार है । प्रमाता – जो अनुभव-ज्ञान ग्रहण करता है उसे प्रमाता कहा जाता है । अनुभव-ज्ञान ग्रहण करने के लिये व्यक्ति जिस भी ज्ञानेन्द्री का प्रयोग करता है , उसे प्रमाण कहा जाता है । ज्ञातव्य है कि व्यक्ति की पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ पाँच प्रमाण होती हैं । अनुभव-ज्ञान का जो लक्ष्य होता है उसे प्रमेय कहा जाता है । जो कर्म को करने वाला व्यक्ति है उसे कर्ता कहा जाता है । किसी भी कर्म को करने के लिये कर्ता-व्यक्ति जिस भी कर्मेन्द्रिय का प्रयोग करता है , उसे करण कहा जाता है । ज्ञातव्य है कि व्यक्ति के पास पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं , वह पाँचो कर्मेन्द्रियाँ पाँच करण होती हैं । कर्ता व्यक्ति की कर्म को करने के लिये प्रयोग की जा रही कर्मेन्द्रि के उद्यम् से सृजित होने वाले फल को कार्य कहा जाता है ....... क्रमश:   

पद-पदार्थ

पद-परिचय-सोपान   पद-पदार्थ नाम-रूप की जोडी है । घट नाम है । यह पद है । घट-रूप-वृत्ति रूप है । घट-रूप-वृत्ति रूप घट पद का पदार्थ है । पट नाम है । यह पद है । पट-रूप-वृत्ति रूप है । पट-रूप-वृत्ति रूप पट पद का पदार्थ है । किसी शिशु का जन्म होता है , उसका नाम-करण किया जाता है । शिशु का नाम उस नव-जन्में-शिशु की रूप-वृत्ति-रूप का पद है । उपरोक्त किये गये नाम-करण पद का वह नव-जन्मा-शिशु पदार्थ है । यह लोक-व्यवहार का प्रचलित स्वरूप है । प्रत्येक रूप को एक विलक्षण नाम के साथ सम्बद्ध करना लोकव्यवहार है । वस्तु नाम पद होता है । वस्तु रूप उस पद का पदार्थ होता है । इस स्थल पर विशेष उल्लेखनीय है कि व्यक्ति के पास पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं । उपरोक्त वर्णित उदाहरणों में रूप , जो कि चक्षु इन्द्री का ज्ञेय क्षेत्र है , के लिये व्यक्त किया गया है । परन्तु निवेदन है कि उपरोक्त उदाहरण को प्रत्येक पाँच ज्ञानेन्द्रियों के लिये जिज्ञासु पाठक स्वयँ विस्तार करे ं , यथा खट्टा नाम है । पद है । खट्टा-स्वाद-वृत्ति खट्टा पद का पदार्थ है ....... क्रमश:

पटाक्षेप

पटाक्षेप अब तक की ज्ञान-गंगा-यात्रा में आप परिचित हो गये हैं कि अब तक का जीवन आप एक भ्रामक परिचय के आश्रय पर जीते आये हैं । जिस शरीर-मस्तिष्क समुदाय को आप अपना परिचय बताते हैं , वह जड पदार्थों से निर्मित और स्वयं जड स्वभाव का हैं । आप कहेंगे कि परन्तु हम तो चेतन हैं । आप का कहना भी सत्य है । आप चेतन सदृष्य व्यवहार कर रहे हैं , परन्तु आपका चेतन आपकी शरीर-मस्तिष्क समुदाय की अपनी सम्पत्ति नहीं है । आपका चेतन आपकी शरीर-मस्तिष्क समुदाय का मौलिक धर्म नहीं है । अब आप प्रश्न करेंगे कि फिर यह चेतन व्यवहार क्या है ? उत्तर है , चेतन-तत्व आपकी शरीर-मस्तिष्क-समुदाय से विलक्षण आपकी आत्मा का प्रसाद है । उपरोक्त कथित चेतन-तत्व-आत्मा का बोध ही वर्तमान ज्ञान-गंगा-प्रवाह का लक्षित गन्तव्य स्थल है । परन्तु यह आत्मा सूक्ष्मतम तत्व है जिसका ज्ञान-बोध केवल वेद-शास्त्र के आश्रय द्वारा क्रमबद्ध प्रयत्नों से ही सम्भव हो सकता है । उपरोक्त वर्णित प्रयत्न में उद्यत होने से पूर्व आपका परिचय कुछ नामों , कुछ प्रक्रियाओं , कुछ स्थितियों से कराना इसलिये आवश्यक है क्योंकि इनका प्रयोग बारम्बार उपरोक्त-कथित ज्ञान...